मेरी महोब्बत की कश्ति को हम ,
मजधार में तूफान की ओर ले चल दिए |
किनारों पे बैठ के सिसकियां ना लेते,
साहील की तमन्ना की ओर चल दिए ||
जानते थे डूबेगी कश्ती , मगर तूफान से,
उलज्ने हम जान बुज़ कर चल दिए |
कहा था सबने, डूबेगी यह कश्ती,
पर तुफानो से टकराना मेरी आदत हो लिए ||
आया तूफान का सैलाब डूब गए हम,
हमारी कश्ती समेत,जब पता चलाए |
तूफां सिमट नए किनारे पे आ गए,
नए अरमानों की गोदी में जा बिठाए ||
नलिनी सिंह " नीशी "

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