और नहीं लिख पाऊ मै, आँखे छलक मेरी भर आई रे|
कितने अनमोल दृश्य उभर आये रे, आँख बंद कर बैठी हूँ मै ||
अनसुलझे सवाल दिल के पास रे, संग बिताए हुए लम्हे है पास मेरे |
उस नादान को प्यार ही नही, तब तो वो जखम पे जखम दे जा रहा है ||
तोड़ के बिखेर दिया अनगिनत टुकडो मे, चुपके चुपके ये सहना है |
टूटे से अनगिनत टुकडो से,मेरे दिल मे अनगिनत घाव उभर आये है ||
मताए ग़म इश्क़ बन गया अश्क रे,
अनगिनत अश्क आँखों से रुक ना पाए रे
और नहीं लिख पाऊ मै, आँखे छलक मेरी भर आई रे ..
नलिनी सिंह " नीशी "

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