धरती गगन निखर गए हैं आज,
कुदरत के नज़ारे तरसे है आज,
क़यामत का इन्तेजार पाया हैं आज,
महोब्बत का नशा छाया हैं आज,
अजीब आरज़ू दीदार की हैं आज,
बेपनाह महोब्बत मची हैं आज,
यादों की हल चल मची हैं आज,
" नीशी " ख्वाबो की बारात सजी हैं आज.
नलिनी सिंह " नीशी "
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